हरा-भरा त्यौहार है
यह फूल-देई
प्रकृति का श्रृंगार है!!
अर्थ को इसके
धरातल पर उतारना
इसे केवल मनाना मत
हृदय से संभालना
जो उतरा यह श्रृंगार
तो समझो जीवन बेकार है!!
हरा-भरा त्यौहार है
यह फूल-देई
प्रकृति का श्रृंगार है!!
मुझे नहीं पता, मैं कैसा लिखता हूँ? अच्छा लिखता हूँ या बुरा लिखता हूँ! खरा लिखता हूँ या खोटा लिखता हूँ! मुझे नहीं पता, मैं कैसा लिखता हूँ? मगर जो भी लिखता हूँ!! मगर जो भी लिखता हूँ!! हक़ीक़ते जिंदगी लिखता हूँ!!! मुझे नहीं पता, मैं कैसा लिखता हूँ?
हरा-भरा त्यौहार है
यह फूल-देई
प्रकृति का श्रृंगार है!!
अर्थ को इसके
धरातल पर उतारना
इसे केवल मनाना मत
हृदय से संभालना
जो उतरा यह श्रृंगार
तो समझो जीवन बेकार है!!
हरा-भरा त्यौहार है
यह फूल-देई
प्रकृति का श्रृंगार है!!
कोई बात नहीं
अग़र खुश न रह सको!
कवि कहता है इतना
मग़र चिंता न किया करो!
हर बारिस के बाद
धूप निकलती है!
हर रात के बाद
दिन निकलता है!
बस इस सच्चाई को
स्वीकार कर लिया करो!
कोई बात नहीं!!
अग़र कुछ न कर सको!!
लम्हा बदलता है हरपल
बस इंतज़ार कर लिया करो!!!!!
अंदर से हों खुश यदि
तो कलियाँ खिलती हैं!
धूप, बारिस, हवा, पानी
सब एहसास हैं जिंदगी के!
खो दे इन्हें जो, तो
जिंदगी टूटती है!
जरूरत यहाँ किसी को
किसी की नहीं है!
यह दुनियाँ का मेला है
अकेले ही घूमना है!
ग़म तो हैं फैले आज
हर किसी के जीवन में
बिन माँगे मिल जाएंगे!
पर मिल जाये अपना सा
अग़र कोई रहगुज़र
तो कुछ पल जिंदगी के
हँस के बाँट लेना है!!!
मैं कहता वही हूँ
जो दिल-ए-बाग़ में
कुछ हलचल कर दे!
कर ले कोई तसव्वुर फिर
चाहे तो फिर मुँह मोड़ दे!!
हँसना, रोने से बेहतर है
दिल के अरमानों को
कागज़ पे उतारना बेहतर है
क्या रखा है चिलमने खामोशी में
आओ करलें कुछ बातें