रविवार, 13 मार्च 2022

फूलदेई-ए-श्रृंगार

हरा-भरा त्यौहार है

यह फूल-देई

प्रकृति का श्रृंगार है!!

अर्थ को इसके

धरातल पर उतारना

इसे केवल मनाना मत

हृदय से संभालना

जो उतरा यह श्रृंगार

तो समझो जीवन बेकार है!!

हरा-भरा त्यौहार है

यह फूल-देई

प्रकृति का श्रृंगार है!!

गुरुवार, 10 मार्च 2022

एहतराम-ए-रिश्ता

एहतराम-ए-रिश्ता
होना ही चाहिए!
गुल-ए-बाग़
खिलना ही चाहिए!
चाँद-ए-आसमाँ
आसमाँ-ए-दीदार
होना ही चाहिए!
याद-ए-दिल्लगी
एहसास-ए-याद
होना ही चाहिए!
यह कोई सौदा नहीं
जो मोल भाव 
करके ही होना चाहिए!!

आकांक्षा-ए-मुस्कुराहट

साँसों की गिनती!
जैसे की नहीं जाती!!!
मुस्कुराने की वज़ह!
कभी ढूंढी नहीं जाती!!!
कुछ मिले तो !
मुस्कुरा लो!!
कुछ न मिले !
तो मुस्कुरा लो!!!
मुस्कुराहट में कुछ!
खोया नहीं जाता!!!
सच्ची हो मुस्कान !
तो हर घाव है भर जाता!!!

गुरुवार, 3 मार्च 2022

आयना-ए-जिंदगी

ख़ुशी और ग़म
दो पहलू हैं
जिंदगी के!!!
हर वक़्त बदलेगा
जी रहे हो अगर
जिंदगी को!!!
रुक गए तो
अकेले, बेबस से
हो जाओगे!!
जो बढ़ लिए आगे
तो फिर हर लम्हें की
आगोश में खो जाओगे!!!

शनिवार, 11 दिसंबर 2021

नमन-ए-वीर

 कभी-कभी लम्हां भी
खामोश हो जाता है!


कहते हैं, वक़्त गुजरता है
मग़र कभी-कभी 
थम सा जाता है!


बस इक चुभन सी
रह जाती है याद में!


लेकिन गर्व से 
सीना तन जाता है!!

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

अर्पण-ए-ख़ामोशी

चुप रहना 
कभी कभी!

हर जवाब
कह देता है!

थाम रिश्तों की
रेशम सी डोर!

कई अफ़साने
बुन देता है!!

रविवार, 17 अक्टूबर 2021

हक़ीक़ते-ए-जिंदगी

 कोई बात नहीं

अग़र खुश न रह सको!

कवि कहता है इतना 

मग़र चिंता न किया करो!

हर बारिस के बाद 

धूप निकलती है!

हर रात के बाद 

दिन निकलता है!

बस इस सच्चाई को 

स्वीकार कर लिया करो!

कोई बात नहीं!!

अग़र कुछ न कर सको!!

लम्हा बदलता है हरपल

बस इंतज़ार कर लिया करो!!!!!

हँसी-ए-रहगुज़र

अंदर से हों खुश यदि

तो कलियाँ खिलती हैं!

धूप, बारिस, हवा, पानी

सब एहसास हैं जिंदगी के!

खो दे इन्हें जो, तो

जिंदगी टूटती है!

जरूरत यहाँ किसी को

किसी की नहीं है!

यह दुनियाँ का मेला है

अकेले ही घूमना है!

ग़म तो हैं फैले आज

हर किसी के जीवन में

बिन माँगे मिल जाएंगे!

पर मिल जाये अपना सा

अग़र कोई रहगुज़र 

तो कुछ पल जिंदगी के

हँस के बाँट लेना है!!!


शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

अर्पित-ए-तसव्वुर

 मैं कहता वही हूँ

जो दिल-ए-बाग़ में

कुछ हलचल कर दे!

कर ले कोई तसव्वुर फिर

चाहे तो फिर मुँह मोड़ दे!!

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

हँसी-ए-मल्लिका

हँसना, रोने से बेहतर है

दिल के अरमानों को

कागज़ पे उतारना बेहतर है

क्या रखा है चिलमने खामोशी में

आओ करलें कुछ बातें

मन की मन से गुफ़्तुगू बेहतर है!!

हिमालय की गोद में

हिमालय की गोद में