मुझे नहीं पता, मैं कैसा लिखता हूँ? अच्छा लिखता हूँ या बुरा लिखता हूँ! खरा लिखता हूँ या खोटा लिखता हूँ! मुझे नहीं पता, मैं कैसा लिखता हूँ? मगर जो भी लिखता हूँ!! मगर जो भी लिखता हूँ!! हक़ीक़ते जिंदगी लिखता हूँ!!! मुझे नहीं पता, मैं कैसा लिखता हूँ?
बुधवार, 4 अगस्त 2021
"नारी"
घोर अँधेरी रात में!
रोशनी की किरण है!
तपती हुई रेत में!
छाया का मरहम है!!
दुनियाँ के!
रिवाजों से जूझती!
तूफ़ान में खड़ी चट्टान है!
खुद टूटती बिखरती!
मग़र रिश्तों को संभालती!
एक क़ायनात है!!
एक दिवस नहीं!
हर दिवस उनका ही है!
कभी न लेती अवकाश
इसीलिए अन्नपूर्णा है!!
पहले तो होता था!
मग़र आज भी!
जिनकी महिमा का!
तिरस्कार जारी है!
अर्पण है मेरे!
ये चंद लफ़्ज!
उन सभी को!
जिन्हें कहती यह दुनियाँ!
नारी है!!
मंगलवार, 3 अगस्त 2021
रिश्ता-ए-अँधेरा
रोशनी है बिखरी
जिंदगी में तुम्हारे
सुनकर खुशी हुई!!
मग़र न तोड़ना
अंधेरे से रिश्ता!!
यह वही है जिससे
ग़म में दोस्ती तुम्हारी हुई!!
जब हर तऱफ फैला था सन्नाटा
यह वही है जिसने तुम्हें संभाला!!
इसी ने सिखाया तुम्हें लड़ाई-ए-ज़ज़्बा
यह वही है जिससे रोशनी तुम से रूबरू हुई!!
सोमवार, 2 अगस्त 2021
एहसास-ए-आप
आप की अनोखी बात है
साथ नहीं पर साँस है!!
संग जिए जो पल आपके
हर लम्हां मुझे याद है!!
बातें वो पुरानी जो कही आपने
आज भी इक एहसास है!!
दिल में मेरे रहते हो आप
यह धड़कन आपकी ही सौगात है!!
आप की अनोखी बात है
साथ नहीं पर साँस है!!
एहसास-ए-आप
आप की अनोखी बात है
साथ नहीं पर साँस है!!
संग जिए जो पल आपके
हर लम्हां मुझे याद है!!
बातें वो पुरानी जो कही आपने
आज भी इक एहसास है!!
दिल में मेरे रहते हो आप
यह धड़कन आपकी ही सौगात है!!
आप की अनोखी बात है
साथ नहीं पर साँस है!!
धर्म-ए-चश्मा
धर्म के नाम पर....
हर वक़्त ............
अधर्म करते हैं.......
लोग भी कैसे कैसे..
कर्म करते हैं.........
प्यार है स्वरूप..........
राम-रहीम-यीशु का..
और इसे ही छोड़कर
बाक़ी सब कुछ......
किया करते हैं........
लम्हां-ए-ख़ुशी
ग़मों से लिपटा न करो
बस हर लम्हां मुस्कुराया करो!!
जिस तरह चढ़ता है धीरे धीरे
मेहेंदी का रंग हाथों में!!
उसी तरह ख़ुशियाँ भी होले होले
रागिनी सुनायेंगी!
बस थोड़ा सब्र करो!!
ग़मों से लिपटा न करो
बस हर लम्हां मुस्कुराया करो!!
रविवार, 1 अगस्त 2021
सीख-ए-जिंदगी
भूतकाल से सीख
वर्तमान में जीना!
कंचन की तरह
चमक उठोगे!
बस यही है कहना!
भविष्य के इंतज़ार में
कभी ना!
खुद को खोना!!
भूतकाल से सीख
वर्तमान में जीना!
दवा-ए-हम
क्यों है छुपाया
सीने में दर्द!!
क्यों हरा है
बेदर्द ज़ख्म!!
बयाँ कर दो
बस इक बार!!
कर लो यंकी
फिर दवा हैं हम!!
शख़्स-ए-दिल्लगी
ख़ामोशी को सुन ले जो!
वो शख्स हो तुम!!
रेशम की डोर सी बँधे हो!
मेरे हाथों की नब्ज़ हो तुम!!
तौफा क्या दें तुम्हें!
खुद इक तौफा हो तुम!!
इसलिए लिखते हैं एहसास!
जिसका हर एक लफ्ज़ हो तुम!!
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